हव्यात जाणिवा जरा, मनात चेतना हवी
जुळे न गीत त्याविना, उरात वेदना हवी
अनंगरंगही दिसो, दिसोत केशरी छटा
अधीर वासना हवी, प्रशांत साधना हवी
निमग्न लोकरंजनार्थ शब्दमाधवी हवी
हवेत शब्द तीक्ष्णही, विचार-चालना हवी
अभंग, भारुडे, स्तवन, कथा, पुराण रोजचे
कधी तरी डफावरील थाप सज्जना हवी
भुकेजले जळे उदर, जळे भुके शरीरही
कशास पेटवून मन अजून यातना हवी ?
जगात दु:ख केव्हढे बघेनही, द्रवेनही
बघायला नजर मला, तुझी, दयाघना, हवी
असोत बंद दार, तावदान, कान, नेत्रही
शिरावयास फक्त एक फट प्रभंजना हवी
पणास काव्य लावता स्वत:च लागलास तू
अजून जीवनात ह्या किती विटंबना हवी ?
कुळात जन्म घेतलास कोणत्या, मिलिंद, तू ?
न जानवे, शिखा इथे; कवीस कल्पना हवी
जिस ओर देखता हूँ उसकी निशानियाँ है
यह और बात मेरी नजरें धुवाँ धुवाँ है
मैं हाथ थाम लेता गर पासबाँ न होते
उसकी कलाइयोंमें दरवान चूडियाँ हैं
बिजली गिरागिराकर पूछो न दिलजलोंसे
दिल दाग दाग क्यों है, क्यों खा़क बस्तियाँ हैं ?
आए रकीब कितने इस प्यार के सफ़रमें
लूटें मुहाफ़िजोंने इस बार कारवाँ हैं
वह टूटनाभि, यारों, कितना हसीन होगा
दीदार संगदिल का, जब ख़्वाब शीशियाँ है
सायें है ज़िंदगीपर गुजरे हुए दिनोंके
काजलभरा समाँ है, पुरपेच बदलियाँ हैं
लो शाम हो चली है उसकी इनायतोंकी
अब रात उम्रभर है, मैं हूँ, उदासियाँ है...
