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होती नही किसीके वह इख़्तियारमें
आकर ख़िजाँ रहेगी बागे-बहारमें


मैं अंजुमन अकेला, तनहा हजारमें
इतना कभी न खुश था जितना मज़ारमें


अरसा हुआ किसीकी आहट सुने हुए
पाज़ेब क्या बजेंगे उजडे दयारमें ?


ना शाम-ए-ग़म कटी, ना रातें फ़िराक़की
इक उम्र कट गई है सब्रोकरारमें


सहरा-ए-ज़िंदगीमें चलती हैं आँधियाँ
किसके निशाँ रहें हैं बाकी गुबारमें ?

अवसेला पिंपळ सळसळतो, स्पर्श भुतांचा होत असावा
अथवा कोणा वेताळाच्या उच्छ्वासाचा झोत असावा


आडामधल्या कुंवार माता अश्वत्थावर वसल्या होत्या
पंचक्रोशितिल सभ्य कुळांचा जमलेला गणगोत असावा


पारावरल्या मुंजाशी मी हल्ली गट्टी करतो आहे
विस्मृतीतल्या बाल्याचा धूसर धागा दोहोत असावा


अश्वत्थाच्या पानोपानी कर्मकहाण्या अन्‌ रडगाणी
वेताळ्याच्या प्रश्नांचाही तोच, विक्रमा,  स्रोत असावा


केवळ शीर्षासन केल्याने योगपुरुष का ठरतो कोणी ?
मुळे ऊर्ध्व अन्‌ खाली फांद्या असा तरू लाखोत असावा


भूतखेत, मुंजे अन्‌ हडळी, ’मिलिंद” कसली तुझी शाहिरी ?
शब्द भरजरी अन्‌ कवनाचा गर्भरेशमी पोत असावा

गोतें लगा रहा हूँ सागर की मौज में
ना सीपमें है मोती, मस्ती न जाम में

बिन लडखडाए चलना आसाँ नहीं रहा
क्यों होश माँगते हो पीने के दौर में ?

दुखमें नशा रहेगा शायद शराबसा
डूबे रहें वगरना क्यों लोग सोग में ?

अब क्या तुम्हें बताऊँ जख़्मों की दास्ताँ
दुष्मन करीब आए रिश्तों की ओट में

ऐसा नहीं के मुझको सागरसे प्यार है
होता नहीं सभीके साहिल नसीब में

ऐ दोस्त, मैकदे की यह राह तो नहीं ?
देखी न भीड ऐसी मस्जिद में, दैर में

इस मैकदेसे आखिर ना प्यास बुझ सकी
पीरी हुई, चला हूँ ; आया शबाबमें

आये, गये सुखनवर अच्छे, बुरे कईं
किसने सुनी किसीकी दुनिया के शोरमें ?

बाज़ार में मिलेगी हर शै, ’मिलिंद’ पर
तू तो निकल पडा है इन्साँ की खोज में...

रोज़ खुशबू यार की लाया न कर
ऐ सबा, ख्वाबों को सहलाया न कर

बढ न जाए दर्दे-दिल हदसे कहीं
दिल मेरा ऐसे तो बहलाया न कर

कर न बैठूं मैं कही गुस्ताखियाँ
मेरी जानिब देख मुस्काया न कर

रूठकर तुझसे न वह पर्दा करे
दिल कहीं तू और बहलाया न कर

टूटना मुमकिन है उनका जानकर
देखनेसे ख्वाब घबराया न कर

आखरी उपहार है तू यार का
उम्रभर, ऐ जख्म़, भर जाया न कर

गझलेतील काही शब्दांचे अर्थ गझलेनंतर खाली दिलेले आहेत.


दर्दे-दिल फ़िर बढ रहा है, जामे-उल्फ़त दे मुझे
प्यास दो दिन की नही यह, ताकयामत दे मुझे

कौन कहता है दवा इस मर्ज़ की कोई नही
इक झलक मुखडा दिखा जा और राहत दे मुझे

सुर्ख होटों की सुराही मैकशों की जुस्तजू
सिर्फ़ दो बुंदें चुरा लूँ गर इजाज़त दे मुझे

जाम भी है और साकी भी नज़र के सामने
मैकदे तक जा न पाऊँ यह सज़ा मत दे मुझे

या जलाकर शम्म उल्फ़त की मुझे पुरनूर कर
या शिकस्ता-इश्क़-मजनू की शहादत दे मुझे

यूँ परायीसी नज़रसे देखना अच्छा नही
या निगाहोंमें मुहब्बत या अदावत दे मुझे

छेड ले जी-भर मुझे तू पर ज़रा यह सोच ले
रब किसी दिन भूलकर तुझसी न फ़ितरत दे मुझे


छेड ले जी-भर मुझे तू पर ज़रा यह सोच ले
देख तेरी दिल्लगीको कौन इज़्ज़त दे मुझे ?

कुलमिलाकर प्यार की दो-चार घडियाँही मिली
वस्ल की शबभी सबरकी ना हिदायत दे मुझे

मैं नज़रसे पी रहा हूँ शोखियाँ जब हुस्नकी
एक कतराभी न छलके यह निआमत दे मुझे

बुतपरस्ती की बुराई खूब तू कर ले मगर
देख ले वाइज़ उसे तू, फ़िर नसीहत दे मुझे


  1. जामे-उल्फ़त : जाम=पेला, उल्फ़त=प्रेम
  2. ताकयामत : ता=पर्यंत, कयामत=प्रलय येऊन सृष्टीचा अंत होण्याचा व ईश्वरी निर्णयाचा दिवस
  3. मर्ज़ : रोग, आजार
  4. राहत : आराम
  5. मैकश : मै=मद्य, मैकश=मद्यपी
  6. जुस्तजू : शोध, हुडकून काढण्याची धडपड
  7. पुरनूर : प्रकाशमय, तेजोमय
  8. शिकस्ता-इश्क : शिकस्ता=पराभूत, शिकस्ता-इश्क=प्रेमात पराभूत झालेला, प्रेमभंग झालेला
  9. शहादत : हौतात्म्य, बलिदान
  10. अदावत : वैर, शत्रुत्व
  11. फ़ितरत : स्वभाव
  12. वस्ल : मीलन
  13. हिदायत : सूचना, शिकवण
  14. शोखियाँ : नटवेपणा, नखरे
  15. हुस्न : सौंदर्य
  16. कतरा : थेंब
  17. निआमत : कृपालाभ, कृपाशीर्वाद, blessing
  18. बुतपरस्ती : मूर्तीपूजन
  19. वाइज़ : धर्मोपदेशक
  20. नसीहत : उपदेश

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